Oct 12, 2015

कोई भी काम करें उसे अपना कर्तव्य समझकर ही करें

बहुत समय पहले की बात है एक राजा था। उसे राजा बने लगभग दस साल हो चुके थे। पहले कुछ साल तो उसे राज्य संभालने में कोई परेशानी नहीं आई। फिर एक बार अकाल पड़ा। उस साल लगान न के बराबर आया। राजा को यही चिंता लगी रहती कि खर्चा कैसे घटाया जाए ताकि काम चल सके। उसके बाद यही आशंका रहने लगी कि कहीं इस बार भी अकाल न पड़ जाए। उसे पड़ोसी राजाओं का भी डर रहने लगा कि कहीं हमला न कर दें।

एक बार उसने कुछ मंत्रियों को उसके खिलाफ षडयंत्र रचते भी पकड़ा था। राजा को चिंता के कारण नींद नहीं आती। भूख भी कम लगती। शाही मेज पर सैकड़ों पकवान परोसे जाते, पर वह दो-तीन कौर से अधिक न खा पाता। राजा अपने शाही बाग के माली को देखता था। जो बड़े स्वाद से प्याज व चटनी के साथ सात-आठ मोटी-मोटी रोटियां खा जाता था।

रात को लेटते ही गहरी नींद सो जाता था। सुबह कई बार जगाने पर ही उठता। राजा को उससे जलन होती। एक दिन दरबार में राजा के गुरु आए। राजा ने अपनी सारी समस्या अपने गुरु के सामने रख दी। गुरु बोले वत्स यह सब राज-पाट की चिंता के कारण है इसे छोड़ दो या अपने बेटे को सौंप दो तुम्हारी नींद और भूख दोनों वापस आ जाएंगी।

राजा ने कहा नहीं गुरुदेव वह तो पांच साल का अबोध बालक है। इस पर गुरु ने कहा ठीक है फिर इस चिंता को मुझे सौंप दो। राजा को गुरु का सुझाव ठीक लगा। उसने उसी समय अपना राज्य गुरु को सौंप दिया। गुरु ने पूछा अब तुम क्या करोगे। राजा ने कहा कि मैं व्यापार करूंगा। गुरु ने कहा राजा अब यह राजकोष तो मेरा है। तुम व्यापार के लिए धन कहां से लाओगे। राजा ने सोचा और कहा तो मैं नौकरी कर लूंगा।

इस पर गुरु ने कहा यदि तुमको नौकरी ही करनी है तो मेरे यहां नौकरी कर लो। मैं तो ठहरा साधूु मैंं आश्रम में ही रहूंगा, लेकिन इस राज्य को चलाने के लिए मुझे एक नौकर चाहिए। तुम पहले की तरह ही महल में रहोगे। गद्दी पर बैठोगे और शासन चलाओगे, यही तुम्हारी नौकरी होगी। राजा ने स्वीकार कर लिया और वह अपने काम को नौकरी की तरह करने लगा। फर्क कुछ नहीं था काम वही था, लेकिन अब वह जिम्मेदारियों और चिंता से लदा नहीं था।

कुछ महीनों बाद उसके गुरु आए। उन्होंने राजा से पूछा कहो तुम्हारी भूख और नींद का क्या हाल है। राजा ने कहा- मालिक अब खूब भूख लगती है और आराम से सोता हूं। गुरु ने समझाया देखें सब पहले जैसेा ही है, लेकिन पहले तुमने जिस काम को बोझ की गठरी समझ रखा था। अब सिर्फ उसे अपना कर्तव्य समझ कर रहे हो। हमें अपना जीवन कर्तव्य करने के लिए मिला है। किसी चीज को जागीर समझकर अपने ऊपर बोझ लादने के लिए नही।

सीख: 1. काम कोई भी हो चिंता उसे और ज्यादा कठिन बना देती है।
2. जो भी काम करें उसे अपना कर्तव्य समझकर ही करें। ये नहीं भूलना चाहिए कि हम न कुछ लेकर आए थे और न कुछ लेकर जाएंगे।

आत्मा को अमर क्यों माना जाता है?

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार आत्मा ईश्वर का अंश है। इसलिए यह ईश्वर की ही तरह अजर और अमर है। संस्कारों के कारण इस दुनिया में उसका अस्तित्व भी है। वह जब जिस शरीर में प्रवेश करती है, तो उसे उसी स्त्री या पुरुष के नाम से जाना जाता है।आत्मा का न कोई रंग होता है न रूप, इसका कोई लिंग भी नहीं होता।
ऋगवेद में बताया गया है1/164/38
जीवात्मा अमर है और शरीर प्रत्यक्ष नाशवान। यह पूरी शारीरिक क्रियाओं का अधिष्ठाता है, क्योंकि जब तक शरीर में प्राण रहता है, तब तक यह क्रियाशील रहता है। इस आत्मा के संबंध में बड़े-बड़े मेधावी पुरुष भी नहीं जानते। इसे ही जानना मानव जीवन का परम लक्ष्य है
बृहदारण्यक 8/7/1उपनिषद में लिखा है
आत्मा वह है जो पाप से मुक्त है, वृद्धावस्था से रहित है, मौत और शोक से रहित है, भूख और प्यास से रहित है, जो किसी वस्तु की इच्छा नहीं करती, इसलिए उसे इच्छा करनी चाहिए, किसी वस्तु की कल्पना नहीं करती, उसे कल्पना करना चाहिए। यह वह सत्ता है जिसको समझने के लिए कोशिश करना चाहिए। श्रीमद्भागवद्गीता में आत्मा की अमरता के विषय पर विस्तृत व्याख्या की गई है।
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता व न भूय:।
अजो नित्य: शाश्वतोअयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।
यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मती है और न मरती ही है न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाली है, क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
वसांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृहणाति नरोअपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।।
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को छोड़कर दूसरे नए शरीर को प्राप्त होती है। शरीर की मृत्यु के बाद आत्मा को प्रेत योनि से मुक्ति के लिए 13 दिनों का समय लगता है। इसलिए इस दौरान आत्मा की शांति के लिए, पूजा- पाठ, दान-दक्षिणा आदि अनुष्ठान किए जाते हैं। इसके बाद आत्मा पितृ लोक को प्राप्त हो जाती है। आत्मा की अमरता का यही दृढ़ विश्वास है।
SOURCE - BHASKER

Oct 5, 2015

अगर आपकी पत्नी में हैं ये 4 गुण तो आप खुद को भाग्यशाली समझें

हिंदू धर्म में पत्नी को पति की अर्धांगिनी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पत्नी पति के शरीर का आधा अंग होती है। महाभारत में भीष्म पितामाह ने कहा है कि पत्नी को सदैव प्रसन्न रखना चाहिए क्योंकि उसी से वंश की वृद्धि होती है।
इसके अलावा भी अनेक ग्रंथों में पत्नी के गुण व अवगुणों के बारे में विस्तार पूर्वक बताया गया है। गरुड़ पुराण में भी पत्नी के कुछ गुणों के बारे में बताया गया है। इसके अनुसार जिस व्यक्ति की पत्नी में ये गुण हों, उसे स्वयं को देवराज इंद्र यानी भाग्यशाली समझना चाहिए। ये गुण इस प्रकार हैं-
सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रियंवदा।
सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता।। (108/18)
अर्थात – जो पत्नी 1. गृहकार्य में दक्ष है, 2. जो प्रियवादिनी है, 3. जिसके पति ही प्राण हैं और जो 4. पतिपरायणा है, वास्तव में वही पत्नी है।
गृह कार्य में दक्ष यानी घर संभालने वाली >
गृह कार्य यानी घर के काम, जो पत्नी घर के सभी कार्य जैसे- भोजन बनाना, साफ-सफाई करना, घर को सजाना, कपड़े-बर्तन आदि साफ करना, बच्चों की जिम्मेदारी ठीक से निभाना, घर आए अतिथियों का मान-सम्मान करना, कम संसाधनों में ही गृहस्थी चलाना आदि कार्यों में निपुण होती है, उसे ही गृह कार्य में दक्ष माना जाता है। ये गुण जिस पत्नी में होते हैं, वह अपने पति की प्रिय होती है।
प्रियवादिनी यानी मीठा बोलने वाली 
पत्नी को अपने पति से सदैव संयमित भाषा में ही बात करना चाहिए। संयमित भाषा यानी धीरे-धीरे व प्रेमपूर्वक। पत्नी द्वारा इस प्रकार से बात करने पर पति भी उसकी बात को ध्यान से सुनता है व उसके इच्छाएं पूरी करने की कोशिश करता है। पति के अलावा पत्नी को घर के अन्य सदस्यों जैसे- सास-ससुर, देवर-देवरानी, जेठ-जेठानी, ननद आदि से भी प्रेमपूर्वक ही बात करनी चाहिए। बोलने के सही तरीके से ही पत्नी अपने पति व परिवार के अन्य सदस्यों के मन में अपने प्रति स्नेह पैदा कर सकती है।
पतिपरायणा यानी पति की हर बात मानने वाली 
जो पत्नी अपने पति को ही सर्वस्व मानती है तथा सदैव उसी के आदेश का पालन करती है, उसे ही धर्म ग्रंथों में पतिव्रता कहा गया है। पतिव्रता पत्नी सदैव अपने पति की सेवा में लगी रहती है, भूल कर भी कभी पति का दिल दुखाने वाली बात नहीं कहती। यदि पति को कोई दुख की बात बतानी हो तो भी वह पूर्ण संयमित होकर कहती है। हर प्रकार के पति को प्रसन्न रखने का प्रयास करती है। पति के अलावा वह कभी भी किसी अन्य पुरुष के बारे में नहीं सोचती। धर्म ग्रंथों में ऐसी ही पत्नी को पतिपरायणा कहा गया है।
धर्म का पालन करने वाली 
एक पत्नी का सबसे पहले यही धर्म होता है कि वह अपने पति व परिवार के हित में सोचे व ऐसा कोई काम न करे जिससे पति या परिवार का अहित हो। गरुड़ पुराण के अनुसार जो पत्नी प्रतिदिन स्नान कर पति के लिए सजती-संवरती है, कम खाती है, कम बोलती है तथा सभी मंगल चिह्नों से युक्त है। जो निरंतर अपने धर्म का पालन करती है तथा अपने पति का प्रिय करती है, उसे ही सच्चे अर्थों में पत्नी मानना चाहिए। जिसकी पत्नी में यह सभी गुण हों, उसे स्वयं को देवराज इंद्र ही समझना चाहिए।
नोट : गरुड़ पुराण पुराने समय का बहुत ही प्रचलित ग्रंथ है। इस ग्रंथ में सुखी जीवन के लिए कई बातें बताई गई हैं। इस पुराण में कुछ बातें ऐसी भी हैं जो आज के समय के लिए प्रासंगिक नहीं हैं और इन बातों का पालन कर पाना सभी के लिए संभव नहीं है। इसीलिए हम यहां बताई गई बातों का समर्थन नहीं करते हैं। ये स्टोरी सिर्फ पाठकों के लिए शास्त्र संबंधी ज्ञान बढ़ाने के लिए है। 
साभार : दैनिक भास्कर

Sep 20, 2015

ग्रंथों के अनुसार पत्नी में होने चाहिए ये खास गुण

हिंदू धर्म में पत्नी को पति की अद्धांगिनी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पत्नी पति के शरीर का आधा अंग होती है। महाभारत में भीष्म पितामह ने कहा है कि पत्नी को सदैव प्रसन्न रखना चाहिए क्योंकि उसी से वंश की वृद्धि होती है। इसके अलावा भी अनेक ग्रंथों में पत्नी के गुण व अवगुणों के बारे में विस्तारपूर्वक बताया गया है। गरुड़ पुराण में भी पत्नी के कुछ गुणों के बारे में बताया गया है। इसके अनुसार जिस व्यक्ति की पत्नी में ये गुण हों, उसे स्वयं को देवराज इंद्र यानी भाग्यशाली समझना चाहिए। ये गुण इस प्रकार हैं-

 

सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रियंवदा।
सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता।। (108/18)

अर्थात- जो पत्नी गृहकार्य में दक्ष है, जो प्रियवादिनी है, जिसके पति ही प्राण हैं और जो पतिपरायणा है, वास्तव में वही पत्नी है।

गृह कार्य में दक्ष यानी घर संभालने वाली 

गृह कार्य यानी घर के काम, जो पत्नी घर के सभी कार्य जैसे- भोजन बनाना, साफ-सफाई करना, घर को सजाना, कपड़े-बर्तन आदि साफ करना, बच्चों की जिम्मेदारी ठीक से निभाना, घर आए अतिथियों का मान-सम्मान करना, कम संसाधनों में ही गृहस्थी चलाना आदि कार्यों में निपुण होती है, उसे ही गृह कार्य में दक्ष माना जाता है। ये गुण जिस पत्नी में होते हैं, वह अपने पति की प्रिय होती है।

 मीठा बोलने वाली

पत्नी को अपने पति से सदैव संयमित भाषा में ही बात करना चाहिए। संयमित भाषा यानी धीरे-धीरे व प्रेमपूर्वक। पत्नी द्वारा इस प्रकार से बात करने पर पति भी उसकी बात को ध्यान से सुनता है व उसके इच्छाएं पूरी करने की कोशिश करता है। पति के अलावा पत्नी को घर के अन्य सदस्यों जैसे- सास-ससुर, देवर-देवरानी, जेठ-जेठानी, ननद आदि से भी प्रेमपूर्वक ही बात करनी चाहिए। बोलने के सही तरीके से ही पत्नी अपने पति व परिवार के अन्य सदस्यों के मन में अपने प्रति स्नेह पैदा कर सकती है।  

Popपति की हर बात मानने वाली

जो पत्नी अपने पति को ही सर्वस्व मानती है तथा सदैव उसी के आदेश का पालन करती है, उसे ही धर्म ग्रंथों में पतिव्रता कहा गया है। पतिव्रता पत्नी सदैव अपने पति की सेवा में लगी रहती है, भूल कर भी कभी पति का दिल दुखाने वाली बात नहीं कहती। यदि पति को कोई दुख की बात बतानी हो तो भी वह पूर्ण संयमित होकर कहती है। हर प्रकार के पति को प्रसन्न रखने का प्रयास करती है। पति के अलावा वह कभी भी किसी अन्य पुरुष के बारे में नहीं सोचती। धर्मग्रंथों में ऐसी ही पत्नी को पतिपरायणा कहा गया है।
धर्म का पालन करने वाली 

एक पत्नी का सबसे पहले यही धर्म होता है कि वह अपने पति व परिवार के हित में सोचे व ऐसा कोई काम न करे जिससे पति या परिवार का अहित हो। गरुड़ पुराण के अनुसार, जो पत्नी प्रतिदिन स्नान कर पति के लिए सजती-संवरती है, कम खाती है, कम बोलती है तथा सभी मंगल चिह्नों से युक्त है। जो निरंतर अपने धर्म का पालन करती है तथा अपने पति का प्रिय करती है, उसे ही सच्चे अर्थों में पत्नी मानना चाहिए। जिसकी पत्नी में यह सभी गुण हों, उसे स्वयं को देवराज इंद्र ही समझना चाहिए।

Source - bhasker


Sep 11, 2015

प्रेम प्रसंग और शादी से जुड़ी बातें बताती है हथेली की ये रेखा

प्रेम प्रसंग और शादी से जुड़ी बातें जानने के लिए हथेली की विवाह रेखा का अध्ययन मुख्य रूप से किया जाता है। यहां जानिए विवाह रेखा से जुड़ी खास बातें...
कहां होती है विवाह रेखा
हमारी हथेली में थोड़े-थोड़े समय में कई रेखाएं बदलती रहती हैं। जबकि कुछ खास रेखाएं ऐसी हैं, जिनमें ज्यादा बदलाव नहीं होते हैं। इन महत्वपूर्ण रेखाओं में जीवन रेखा, भाग्य रेखा, हृदय रेखा, मणिबंध, सूर्य रेखा, विवाह रेखा शामिल है। हस्तरेखा ज्योतिष के अनुसार, विवाह रेखा से किसी भी व्यक्ति के प्रेम प्रसंग और वैवाहिक जीवन पर विचार किया जाता है। विवाह रेखा सबसे छोटी उंगली (लिटिल फिंगर) के नीचे वाले भाग पर आड़ी स्थिति में होती है। छोटी उंगली के नीचे वाले भाग को बुध पर्वत कहा जाता है। विवाह रेखा एक या एक से अधिक भी हो सकती है।
यहां जानिए विवाह रेखा से जुड़ी खास बातें...
1. यदि किसी व्यक्ति के हाथ में विवाह रेखा और हृदय रेखा के बीच की दूरी बहुत ही कम है तो ऐसे लोगों का विवाह कम उम्र में होने की संभावनाएं होती हैं। आमतौर पर विवाह रेखा और हृदय रेखा के बीच की दूरी ही व्यक्ति के विवाह की उम्र बताती है। इन दोनों रेखाओं के बीच जितनी अधिक दूरी होगी विवाह उतने ही अधिक समय बाद होता है। ऐसी संभावनाएं काफी अधिक रहती हैं।

2. यदि किसी व्यक्ति के दोनों हाथों में विवाह रेखा की शुरुआत में दो शाखाएं हों तो उस व्यक्ति की शादी टूटने का डर रहता है।
3. यदि किसी स्त्री के हाथ में विवाह रेखा की शुरुआत में द्वीप का चिह्न हो तो ऐसी स्त्री की शादी किसी धोखे से होने की संभावनाएं रहती हैं। साथ ही, यह निशान जीवन साथी के खराब स्वास्थ्य की ओर भी इशारा करता है।

4. यदि किसी व्यक्ति के हाथ में विवाह रेखा बहुत अधिक नीचे की ओर झुकी हुई दिखाई दे रही है और वह हृदय रेखा को काटते हुए नीचे की ओर चले जाए तो यह शुभ लक्षण नहीं माना जाता है। ऐसी रेखा वाले व्यक्ति के जीवन साथी की मृत्यु उसकी मौजूदगी में ही हो सकती है।

5. यदि किसी व्यक्ति की हथेली में विवाह रेखा लम्बी और सूर्य पर्वत तक जाने वाली है तो यह संपन्न और समृद्ध जीवन साथी का प्रतीक है।

6. यदि बुध पर्वत से आई हुई कोई रेखा विवाह रेखा को काट दे तो व्यक्ति का वैवाहिक जीवन परेशानियों भरा होता है।

Source - bhasker

Sep 5, 2015

शनिवार को ये उपाय करने से दूर होते हैं शनि के दोष

शनिवार को शनि और हनुमानजी का पूजन विशेष रूप से किया जाता है। ज्योतिष के अनुसार शनिदेव की कृपा पाने के लिए शनिवार श्रेष्ठ दिन है। इस दिन किए गए उपायों से शनि के दोष शांत हो सकते हैं। मान्यता है कि हनुमानजी के भक्तों को शनि के अशुभ फलों से मुक्ति मिलती है। इसी वजह से कई लोग शनिवार को हनुमानजी की पूजा करते है।
Source - Danik Bhaskar

Aug 21, 2015

यदि आप भी करना चाहते हैं दान तो ध्यान रखें ये बात



पुराने समय से ही धन और अन्य वस्तुओं का दान करने की परंपरा चली आ रही है। आज भी काफी लोग दान करते हैं। दान से अक्षय पुण्य मिलता है और दुखों से मुक्ति मिलती है। साथ ही, जरूरतमंद लोगों को भी खाना और दूसरी जरूरी चीजें मिल जाती हैं। दान किसे करना चाहिए, इस संबंध में ये बात ध्यान रखें कि जिन लोगों के पर्याप्त धन और सुख-सुविधाएं हैं, उन्हें दान न देकर ऐसे लोगों की मदद करें जिन्हें आवश्यकता हो। यहां जानिए एक सच्चे संत का किस्सा, जिसमें बताया गया है कि किसे दान देना श्रेष्ठ होता है...
पुराने समय में एक संत थे जो अपने शरीर पर सिर्फ एक धोती धारण करते थे। इस एक धोती के अतिरिक्त उनके पास कोई दूसरी सांसारिक वस्तु नहीं थी। एक दिन संत की धोती फट गई, उन्हें लगा कि अभी धोती को सिलकर कुछ समय और इसी से काम चलाया जा सकता है। धोती की सिलाई करने के लिए उन्होंने कुटिया में सुई खोजी, लेकिन उनके जैसे संत के यहां सुई कैसे मिलती? इसलिए उन्होंने बबूल के एक कांटे से ही धोती की सिलाई शुरू कर दी।
उसी समय उनका भक्त उनके पास आया और बोला- ‘गुरुदेव इसे फेंक दीजिये, मैं आपके लिए नई धोती ला देता हूं।‘
संत ने कहा- ‘देखो सामने एक बच्चा खड़ा है जो ठंड से ठिठुर रहा है। तुम उसके लिए कपड़ों की व्यवस्था कर दो, समझ लेना कि मैंने तुम्हारी धोती ले ली। मेरी धोती तो अभी कुछ समय और चल जाएगी।‘
संत की बात सुनकर उनका भक्त नतमस्तक हो गया और उस बालक के लिए कपड़ों की व्यवस्था कर दी।

इस किस्से में संत ने यही संदेश दिया है कि ऐसे ही लोगों को दान देना चाहिए, जो वाकई में जरूरतमंद हों।

SOURCE - BHASKER

Jul 12, 2015

"पापा ये कैसे.........

एक गिद्ध का बच्चा अपने बाप से बोला "पापा आज मुझे
इनसान का
गोशत खाना हैं । गि द्ध बोला " ठीक हैं बेटा शाम को
ला दुगा। गिद्ध उडा ओर एक सुअर का गोशत ले कर आया।
गिद्ध का
बच्चा बोला "पापा ये तो सुअर का गोशत है ,
मुझे तो इनसान का गोशत खाना हैं । गिद्ध बोला " रूक शाम
तक मिल
जाऐगा । गिद्ध फिर उडा ओर एक मरी गाय का गोशत ले
कर आया । गिद्ध का बच्चा बोला "पापा ये तो गाय का
गोशत है , मुझे
तो इनसान का गोशत खाना हैं । गिद्ध उडा ओर उसने सुअर का
गोशत
एक मसजिद के आसपास और गाय का गोशत मंदिर
के पास फेक दिया। थोडी देर के बाद वहाँ ढेर
सारी इनसानो की लाशे बिछ गई । बाप बेटो ने
जम के इनसानो का गोशत खाया । गिद्ध का बच्चा बोला
"पापा ये कैसे
हुआ,इतना सारा गोशत " गिद्ध बोला "बेटा ये इनसान है हि
ऐसा ,
धॆम॔ के नाम पर इसे "जानवर"
से भी बदतर बानाया जा सकता है। और ये काम इन
इनसानो में बैठे कई गिद्ध कर रहे है । आज हम ने कर
दिया...........|

Jul 7, 2015

अरी तूने तो मेरा धर्म भ्रष्ट कर दिया



एक दिन पंडित को प्यास लगी, संयोगवश घर में पानी नही था इसलिए उसकी पत्नी पडोस से पानी ले आई,  पानी पीकर पंडित ने पूछा....

पंडित - कहाँ से लायी हो बहुत ठंडा पानी है I

पत्नी - पडोस के कुम्हार के घर से ,
 (पंडित ने यह सुनकर लोटा फैंक दिया और उसके तेवर चढ़ गए वह जोर जोर से चीखने लगा )

पंडित - अरी तूने तो मेरा धर्म भ्रष्ट कर दिया, कुंभार ( शुद्र ) के घर का पानी पिला दिया। पत्नी भय से थर-थर कांपने लगी, उसने पण्डित से माफ़ी मांग ली
पत्नी - अब ऐसी भूल नही होगी। शाम को पण्डित जब खाना खाने बैठा तो घरमे खानेके लिए कुछ नहीं था.

पंडित - रोटी नहीं बनाई. भाजी
नहीं बनाई.

पत्नी - बनायी तो थी लेकिन अनाज पैदा करनेवाला कुणबी(शुद्र) था. और जिस कढ़ाई में बनाया था वो लोहार (शुद्र) के घर से आई थी। सब फेक दिया.

पण्डित - तू पगली है क्या कही अनाज और कढ़ाई में भी छुत होती है? यह कह कर पण्डित बोला की पानी तो ले आओ I

पत्नी - पानी तो नही है जीI

पण्डित - घड़े कहाँ गए हैI

पत्नी - वो तो मेने फैंक दिए क्योंकि कुम्हार के हाथ से बने थेI पंडित बोला दूध ही ले आओ वही पीलूँगा I
पत्नी - दूध भी फैंक दिया जी क्योंकि गाय को जिस नौकर ने दुहा था वो तो नीची (शुद्र) जाति से था न I

पंडित- हद कर दी तूने तो यह भी नही जानती की दूध में छूत नही लगती है I

पत्नी-यह कैसी छूत है जी जो पानी में तो लगती है, परन्तु दूध में नही लगती। पंडित के मन में आया कि दीवार से सर फोड़ ले। गुर्रा कर बोला - तूने मुझे चौपट कर दिया है जा अब आंगन में खाट डाल दे मुझे अब नींद आ रही है I

पत्नी- खाट! उसे तो मैने तोड़ कर फैंक दिया है क्योंकि उसे शुद्र (सुतार ) जात वाले ने बनाया था.

पंडित चीखा - ओ फुलो का हार लाओ भगवन को चढ़ाऊंगा ताकि तेरी अक्ल ठिकाने आये.

पत्नी- फेक दिया उसे माली(शुद्र) जाती ने बनाया था.

पंडित चीखा- सब में आग लगा दो, घर में कुछ बचा भी हैं या नहीं.
पत्नी - हाँ यह घर बचा है, इसे अभी तोडना बाकी है क्योंकि इसे भी तो पिछड़ी जाति के मजदूरों ने बनाया है I पंडित के पास कोई जबाब नही था .

उसकी अक्ल तो ठिकाने आयी बाकी लोगोकी भी आ जायेगी सिर्फ
इस कहानी आगे फॉरवर्ड करो हो सके देश मे जाती वाद खत्म हो जाये

Jun 22, 2015

New Kailash route boosts people-to-people ties


Under grey skies and a light drizzle, 43 Indians bound for the Kailash Mansarovar pilgrimage, crossed the India-China border at Nathu La, pioneering a pilgrim route, and adding another dimension to the Sino-Indian people-to-people contacts.

“It is a great historic day when both people are expressing their utmost confidence in each other thanks to [China’s] President Xi Jinping and Prime Minister Narendra Modi,” said Rajya Sabha member Tarun Vijay, in a conversation with The Hindu . Mr. Vijay is leading the pilgrims, who had queued up on the Indian side of the dizzying 4545-metre pass, before crossing over to the Chinese side.

A traditional welcome awaited the travellers as they cleared immigration at the pass. All the pilgrims were honoured at the pass with Kha Da, a traditional Tibetan white scarf, before they headed for the green buses which would take them for the pilgrimage. The entire distance of 1,500 km would be covered over three days. A three-member team from the Indian embassy in Beijing is accompanying the pilgrims, along with other support and medical staff.

“The new route is more comfortable, more convenient and much safer than the old ones. Instead of traversing days through tough terrain at high risk, you can now reach the sacred place by bus while enjoying the heavenly beauty along the way,” said Le Yucheng at a colourful but simple inaugural ceremony of the new route.

The Nathu La passage for the sacred site seemed to combine spirituality with Soft Power — an essential ingredient of India-China ties, which appear to be undergoing a rapid transformation.


The Chinese side also well understood the empathetic chord that was struck at a people-to-people level by the opening of the new route. “We on the Chinese side understand very well how Kailash Mansarovar features in the Indian mind and will do what we can to make the yatra a pleasant and memorable one,” observed Mr. Le, the ambassador. The Indian side also stressed the link between societal ties, deepened by the new Kailash route, and a thriving Sino-Indian relationship.

Source - The Hindu

May 9, 2015

जानिए मां बगलामुखी की कथा



देवी बगलामुखी जी के संदर्भ में एक कथा बहुत प्रचलित है जिसके अनुसार एक बार सतयुग में महाविनाश उत्पन्न करने वाला ब्रह्मांडीय तूफान उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण विश्व नष्ट होने लगा इससे चारों ओर हाहाकार मच जाता है और अनेकों लोक संकट में पड़ गए और संसार की रक्षा करना असंभव हो गया. यह तूफान सब कुछ नष्ट भ्रष्ट करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था, जिसे देख कर भगवान विष्णु जी चिंतित हो गए.
इस समस्या का कोई हल न पा कर वह भगवान शिव को स्मरण करने लगे तब भगवान शिव उनसे कहते हैं कि शक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई इस विनाश को रोक नहीं सकता अत: आप उनकी शरण में जाएँ, तब भगवान विष्णु ने हरिद्रा सरोवर के निकट पहुँच कर कठोर तप करते हैं. भगवान विष्णु ने तप करके महात्रिपुरसुंदरी को प्रसन्न किया देवी शक्ति उनकी साधना से प्रसन्न हुई और सौराष्ट्र क्षेत्र की हरिद्रा झील में जलक्रीडा करती महापीत देवी के हृदय से दिव्य तेज उत्पन्न हुआ।
उस समय चतुर्दशी की रात्रि को देवी बगलामुखी के रूप में प्रकट हुई, त्र्येलोक्य स्तम्भिनी महाविद्या भगवती बगलामुखी नें प्रसन्न हो कर विष्णु जी को इच्छित वर दिया और तब सृष्टि का विनाश रूक सका. देवी बगलामुखी को बीर रति भी कहा जाता है क्योंकि देवी स्वम ब्रह्मास्त्र रूपिणी हैं, इनके शिव को एकवक्त्र महारुद्र कहा जाता है इसी लिए देवी सिद्ध विद्या हैं. तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं, गृहस्थों के लिए देवी समस्त प्रकार के संशयों का शमन करने वाली हैं.
इन बातों का रखें विशेष ध्यान
पंडित "विशाल' दयानंद शास्त्री के अनुसार बगलामुखी आराधना में निम्न बातों का विशेष ध्यान रखना जरूरी होता है। साधना में पीत वस्त्र धारण करना चाहिए एवं पीत वस्त्र का ही आसन लेना चाहिए। आराधना में पूजा की सभी वस्तुएं पीले रंग की होनी चाहिए। आराधना खुले आकश के नीचे नहीं करनी चाहिए।
आराधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए । साधना डरपोक किस्म के लोगों को नहीं करनी चाहिए। बगलामुखी देवी अपने साधक की परीक्षा भी लेती हैं। साधना काल में भयानक अवाजें या आभास हो सकते हैं, इससे घबराना नहीं चाहिए और अपनी साधना जारी रखनी चाहिए।
साधना गुरु की आज्ञा लेकर ही करनी चाहिए और शुरू करने से पहले गुरु का ध्यान और पूजन अवश्य करना चाहिए। बगलामुखी के भैरव मृत्युंजय हैं, इसलिए साधना के पूर्व महामृत्युंजय मंत्र का एक माला जप अवश्य करना चाहिए। साधना उत्तर की ओर मुंह करके करनी चाहिए। मंत्र का जप हल्दी की माला से करना चाहिए। जप के पश्चात् माला अपने गले में धारण करें।
साधना रात्रि में 9 बजे से 12 बजे के बीच प्रारंभ करनी चाहिए। मंत्र के जप की संखया निर्धारित होनी चाहिए और रोज उसी संखया से जप करना चाहिए। यह संखया साधक को स्वयं तय करना चाहिए।
साधना गुप्त रूप से होनी चाहिए। साधना काल में दीप अवश्य जलाया जाना चाहिए। जो जातक इस बगलामुखी साधना को पूर्ण कर लेता है, वह अजेय हो जाता है, उसके शत्रु उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाते।
SOURCE - naidunia.jagran

कार्य सिद्धि 'हनुमान मंत्र'


देखें कार्य सिद्धि हनुमान मंत्र, इस मंत्र का जाप करने से आपके सभी कार्य और मनोरथ सिद्ध होते है

Source - jagran

भगवान तुंगनाथ के खुले कपाट



भगवान तुंगनाथ के खुले कपाट
रुद्रप्रयाग। मध्य हिमालय स्थित तृतीय केदार तुंगनाथ मंदिर के कपाट शुक्रवार को पारंपरिक रीति रिवाज और भोलेनाथ के जयकारों के बीच श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए हैं। अब आगामी छह माह तक भगवान तुंगनाथ की यहीं पूजा अर्चना की जाएगी।
गुरुवार रात्रि दूसरे पड़ाव चोपता में रात्रि विश्राम करने के पश्चात शुक्रवार की सुबह भगवान तुंगनाथ की विशेष पूजा अर्चना की गई। तत्पश्चात करीब आठ बजे डोली ने तुंगनाथ की ओर प्रस्थान किया। उत्सव डोली करीब 11 बजे मंदिर परिसर पहुंची। यहां भक्तों ने शिव के जयकारों के साथ उत्सव डोली का स्वागत किया। मंदिर समिति के कर्मचारी व हक हकूकधारियों की मौजूदगी में 11.30 बजे शुभ मुर्हुत कर्क लग्न में मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए। इसके पश्चात उत्सव डोली से पंचकेदार, पार्वती व भूतनाथ की मूर्तियों को उतार कर मंदिर के गर्भगृह में स्थापित कर तुंगनाथ की पूजा अर्चना की गई। कपाट खुलने के दिन स्थानीय व दूर दराज क्षेत्रों से भारी संख्या में श्रद्धालु भगवान तुंगनाथ के दर्शनों के लिए उमड़ पड़े।
तुंगनाथ मंदिर में भगवान शिव के ह्दय व बाहु के दर्शन किए जाते हैं। इस मौके पर मंदिर समिति के प्रबंधक प्रकाश पुरोहित, मठापति रामप्रसाद मैठाणी, रविन्द्र मैठाणी, महेशानंद मैठाणी, मुकेश मैठाणी, जीतपाल सिंह भंडारी सुरेन्द्र मैठाणी समेत भारी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे।
Source - jagran.

May 3, 2015

मई के पहले दिन कौनसे शुभ संयोग संवारेंगे आपके काम

1 मई 2015 को शुक्रवार है। शुभ वि.सं.- 2072, संवत्सर नाम- कीलक, अयन- उत्तर, शाके- 1937, हिजरी- 1436, मु. मास- रज्जब-11, ऋतु- ग्रीष्म, मास- वैशाख, पक्ष- शुक्ल है।
शुभ तिथि
त्रयोदशी जया संज्ञक तिथि सम्पूर्ण दिवारात्रि रहेगी। त्रयोदशी तिथि में जनेऊ को छोड़कर समस्त शुभ व मंगल कार्य यथा- विवाह, वास्तु-गृहारम्भ, गृहप्रवेश, यात्रा, प्रतिष्ठा, युद्ध, वस्त्रालंकार धारण तथा अन्य उत्सवादि शुभ कहे गए हैं।
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त्रयोदशी तिथि में जन्मा जातक सामान्यतः धनवान, विद्यावान, पराक्रमी, परोपकारी, बुद्धिमान, योग्य, राज-समाज में मान-सम्मान पाने वाले तथा शास्त्रविज्ञ होता है।
नक्षत्र
हस्त नक्षत्र सम्पूर्ण दिवारात्रि रहेगा। हस्त नक्षत्र में यात्रा, विद्या, विवाहादि मांगलिक कार्य, अलंकार, वस्त्र, औषध, गृहारम्भ, प्रवेश, प्रतिष्ठा तथा अन्य मांगलिक कार्यादि शुभ होते हैं। हस्त नक्षत्र में जन्मा जातक सामान्यतः मेधावी, उत्साही, परोपकारी, शूरवीर, भाग्यशाली, सम्मानित, सुखी और अपने समाज को नेतृत्व देने वाला होता है।
कोई जातक क्रोधी, निर्दयी, अशुभकर्मी, कलहप्रद वातावरण रखने वाला भी होता है। ये दुर्गुण किसी-किसी जातक में किसी पाप योग के प्रभाव से उत्पन्न हो जाते हैं। इनका भाग्योदय लगभग 30-32 वर्ष की आयु तक होता है।
योग
हर्षण नामक नैसर्गिक शुभ योग रात्रि 11.13 तक, तदन्तर वज्र नामक नैसर्गिक अशुभ योग रहेगा। वज्र नामक योग की प्रथम तीन घटी शुभ कार्यों में त्याज्य हैं।
करण
कौलव नामकरण सायं 5.13 तक, तदन्तर तैतिलादि करण रहेंगे।
चंद्रमा
चंद्रमा सम्पूर्ण दिवारात्रि कन्या राशि में रहेगा।
व्रतोत्सव
कल प्रदोष व्रत और विश्व मजदूर दिवस है।
शुभ कार्यों के मुहूर्त
उक्त शुभाशुभ समय, तिथि, वार, नक्षत्र व योगानुसार शुक्रवार को विवाह (केतुवेध व ग्रहणम् दोषयुक्त अति आवश्यकता में), गृहारम्भ अशुद्ध (केतुवेध), गृहप्रवेश, वधु-प्रवेश, द्विरागमन, प्रसूतिस्नान, विद्यारम्भ, कर्णवेध, नामकरण, अन्नप्राशन, कूपारम्भ, चूड़ाकरण, हलप्रवहण व विपणि-व्यापारारम्भ आदि के हस्त नक्षत्र में शुभ मुहूर्त हैं।
वारकृत्य कार्य
शुक्रवार को सामान्यतः नृत्य-वाद्य-गीत-कलारम्भ, सांसर्गिक कार्य, धन व भूमि सम्बंधी कार्य, नवीन वस्त्राभूषण धारण, मनोरंजन के कार्य और कृषि सम्बंधी समस्त कार्य शुभ रहते हैं।
दिशाशूल
शुक्रवार को पश्चिम दिशा की यात्रा में दिशाशूल रहता है। चंद्र स्थिति के अनुसार दक्षिण दिशा की यात्रा लाभदायक व शुभप्रद रहेगी।
Source - rajasthanpatrika